पुणे न्यूज डेस्क: पुणे नगर निगम (PMC) ने अपने 2026–27 के बजट में एक बड़ी पहल का संकेत दिया है। सिविक चीफ नवल किशोर राम ने घोषणा की कि शहर के नगर निगम अस्पतालों में जल्द ही आईवीएफ (IVF) सेंटर शुरू करने की योजना है। अगर यह योजना लागू होती है, तो राज्य में ऐसा करने वाला यह पहला नगर निकाय होगा।
इस पहल का उद्देश्य उन दंपतियों को राहत देना है, जो निजी अस्पतालों में महंगे फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का खर्च नहीं उठा पाते। अतिरिक्त आयुक्त पवनीत कौर के अनुसार, प्रस्तावित केंद्र में Iपुणे न्यूज डेस्क: पुणे नगर निगम (PMC) ने अपने 2026–27 के बजट में एक बड़ी पहल का संकेत दिया है। सिविक चीफ नवल किशोर राम ने घोषणा की कि शहर के नगर निगम अस्पतालों में जल्द ही आईवीएफ (IVF) सेंटर शुरू करने की योजना है। अगर यह योजना लागू होती है, तो राज्य में ऐसा करने वाला यह पहला नगर निकाय होगा।
इस पहल का उद्देश्य उन दंपतियों को राहत देना है, जो निजी अस्पतालों में महंगे फर्टिलिटी ट्रीटमेंट का खर्च नहीं उठा पाते। अतिरिक्त आयुक्त पवनीत कौर के अनुसार, प्रस्तावित केंद्र में IUI, IVF के साथ-साथ स्पर्म और एग बैंक जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। फिलहाल इसकी रूपरेखा तय की जा रही है और शुल्क CGHS के मानकों के अनुसार रखने की बात कही गई है।
हालांकि, इस तरह के केंद्र की स्थापना आसान नहीं है। इसके लिए अत्याधुनिक लैब, एंब्रियो ग्रोथ के लिए विशेष उपकरण, क्रायोप्रिजर्वेशन सिस्टम और ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाओं की जरूरत होती है। अनुमान है कि इसे शुरू करने में 8 से 10 करोड़ रुपये तक का खर्च आएगा, जबकि सालाना संचालन लागत करीब 2 करोड़ रुपये हो सकती है।
दूसरी ओर, इस योजना को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक तरफ बांझपन के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम के मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे को भी मजबूत करने की जरूरत है। ऐसे में इस परियोजना की प्राथमिकता पर बहस जारी है।UI, IVF के साथ-साथ स्पर्म और एग बैंक जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएंगी। फिलहाल इसकी रूपरेखा तय की जा रही है और शुल्क CGHS के मानकों के अनुसार रखने की बात कही गई है।
हालांकि, इस तरह के केंद्र की स्थापना आसान नहीं है। इसके लिए अत्याधुनिक लैब, एंब्रियो ग्रोथ के लिए विशेष उपकरण, क्रायोप्रिजर्वेशन सिस्टम और ऑपरेशन थिएटर जैसी सुविधाओं की जरूरत होती है। अनुमान है कि इसे शुरू करने में 8 से 10 करोड़ रुपये तक का खर्च आएगा, जबकि सालाना संचालन लागत करीब 2 करोड़ रुपये हो सकती है।
दूसरी ओर, इस योजना को लेकर कुछ सवाल भी उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जहां एक तरफ बांझपन के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ नगर निगम के मौजूदा स्वास्थ्य ढांचे को भी मजबूत करने की जरूरत है। ऐसे में इस परियोजना की प्राथमिकता पर बहस जारी है।